शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

मुख्यमंत्री की पीड़ा ने खड़े किए प्रश्नचिह्न

विवेचना एवं विश्लेषण
गरीब आदमी तक सरकार की योजनाएं क्यों नहीं पहुंचती?
मुख्यमंत्री की पीड़ा ने खड़े किए प्रश्नचिह्न
राजस्व शिविरों ने किया आशा का संचार: नरेगा को वैज्ञानिक आधार दें
मेघराज श्रीमाली
इस पखवाड़े घटनाओं की रेलमपेल से थोड़ा हटकर एक छोटा सा समाचार प्रकाशित हुआ जिसने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सोच और उसके अंदर की पीड़ा को उजागर कर दिया। लगा जैसे मेरुगिरि पर बादलों के झुंड ने सहस्त्र धारा प्रवाहित कर दी हो। अपनी अमित वेदना व्यक्त करते हुए गहलोत ने अफसोस जाहिर किया कि ‘60-62 साल के बाद भी हम गरीबों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचा पाए हैं।’ सरकारी योजनाओं का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुंचने के दर्द का गहरा अहसास है उन्हें। उन्होंने आगे कहा कि ‘शिक्षा के अभाव में गरीब फायदा नहीं उठा पाते। राज्य में मुख्यमंत्री जीवन रक्षा कोष है- पूरा पैसा सरकार देती है। बीपीएल परिवार के 36 लाख परिवारों को दो रुपए किलो गेहूं दे रहे हैं लेकिन गरीब आदमी तक यह बात पहुंच ही नहीं पाती।’
अधिकारी जवाबदेह होंगे : गहलोत : राज्य में प्रशासन गांवों के संग अभियान जारी है। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि इस अभियान के तहत लगे शिविरों से कोई भी व्यक्ति निराश नहीं लौटे। यदि ऐसा हुआ तो अधिकारी जवाबदेह होंगे। उन्होंने कहा कि चिकित्सा, शिक्षा, बिजली और पेयजल से जुड़े मामलों को प्राथमिकता से निबटाना होगा। मुख्यमंत्री स्वयं जहां भी जाते हैं शिविरों का औचक निरीक्षण करते हैं। हर स्टाल पर जाकर अधिकारियों से पूछते हैं कि उन्होंने आज क्या किया। उन्होंने मूल निवास, जाति प्रमाण-पत्रों को स्कूलों के माध्यम से जारी करवाने के निर्देश कलेक्टर को दिए। शिविर में स्टाम्प ड्यूटी अथवा टिकट नहीं लगाए जाने की जानकारी ग्रामीण नागरिकों तक पहुंचाने के निर्देश भी दिए।
दोष किसमें है? कमी कहां है? : मुख्यमंत्री ने इन चंद शब्दों में जो अपनी पीड़ा व्यक्त की है, उसने शासकीय योजनाओं की क्रियान्विति की गति और क्रियान्वयन तंत्र की गंभीरता पर बहुत बड़े प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। उनका यह कहना कि 62 साल बीते, फिर भी गरीबों को लाभ नहीं मिला- यह दर्शाता है कि उनकी यह सोच केवल राजस्थान के लिए ही नहीं, अपितु देश के गत 62 वर्षों के ऐतिहासिक क्रम में राजकीय योजनाओं की लक्षित और संकल्पित गतिशीलता के परिणामों पर पुनर्चिंतन और पुनर्विचार की आवश्यकता के संकेत देता है। वनस्थली विद्यापीठ में प्रगट किए गए उनके विचार योजनाओं को क्रियान्वित करने वाले तंत्र में दायित्व बोध जागृत करने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। दोष किसमें है? कमी कहां है? ऐसे प्रश्न हैं जो मन को उद्वेलित कर देते हैं। कभी-कभी लगता है कि क्या योजनाओं को लागू करने वाले लोगों का स्वयं इनमें विश्वास नहीं है? यदि ऐसा है तो उन्हें निर्भीक होकर नि:संकोच अपनी सोच में सरकार को अवगत कराना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें पुन: नई ऊर्जा से सन्नद्ध होकर सरकारी योजनाओं का लाभ गरीब से गरीब सुदूर देहातों के निवासियों तक पहुंचाना चाहिए। यह काम सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि प्रबुद्धजनों और नौजवानों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अन्य कामों के साथ-साथ समाज सेवा का भी संकल्प लें।
हर वर्ष चलाने का सुझाव : इस स्तंभ में पहले भी लिखा जा चुका है कि मुख्यमंत्री गहलोत इस अभियान को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं। उन्होंने विपक्ष से भी इसमें सहयोग मांगा है। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि गांव वालों को अपनी छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान कराने शहर आना और मंत्रियों या मुख्यमंत्री के यहां चक्कर लगाने को विवश होना पड़ता है। गहलोत इन शिविरों के माध्यम से उनकी यह परेशानी दूर करना चाहते हैं। इस अभियान की सफलता को देखते हुए 8 दिसम्बर को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में हर वर्ष ऐसा अभियान चलाने का सुझाव दिया। मुख्यमंत्री ने इस अभियान की समीक्षा करते हुए बताया कि अब तक 28 लाख लोग प्रशासन गांवों के संग अभियान से लाभान्वित हो चुके हैं।
बजट प्रावधानों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करें : देश में हरित क्रांति के जनक तथा विख्यात कृषि शास्त्री प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन ने कहा कि वैज्ञानिकों तथा वैज्ञानिक अकादमियों को नरेगा में लगे मजदूरों के लिए विकास की योजनाएं तैयार करनी चाहिए। वैज्ञानिकों को नरेगा श्रमिकों व उनकी विभिन्न योजनाओं में मदद करनी चाहिए। वे योजनाएं जिनमें तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरत है जैसे भूसंरक्षण, वाटर शेड प्रबंधन, जल संग्रहण तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आदि। डॉ. स्वामीनाथन का मानना था कि नरेगा श्रमिकों को विभिन्न स्तरों पर पुरस्कृत कर उनका वांछित महत्व देना चाहिए। कानून तो यह है कि नरेगा के तहत केवल अकुशल श्रमिकों को काम देना चाहिए लेकिन सच्चाई यह है कि ये श्रमिक ही तमाम तकनीकी परियोजनाओं का निर्वहन कर रहे हैं। यद्यपि ग्राम पंचायतें उनकी मदद कर रही हैं लेकिन फिर भी एक ऐसी वैज्ञानिक बुद्धिमत्ता आवश्यक है जो योजना के तहत आवंटित बजट प्रावधानों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित कर सके।
देश को पेशेवर वैज्ञानिकों की जरूरत : इस संदर्भ में उनका सुझाव था कि हर शहर में आईआईटी और कृषि विश्वविद्यालय स्थापित होने चाहिए ताकि पेशेवर वैज्ञानिक जरूरत पूरी हो सकें। डॉ. स्वामीनाथन जयपुर में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित वैज्ञानिक विचार गोष्ठी में प्रमुख वक्तव्य देने के लिए आए थे।
इंदिरा गांधी परियोजना को विशेष कृषि क्षेत्र घोषित करें : डॉ. स्वामीनाथन ने माना कि सामाजिक अंकेक्षण में अनियमितताओं से योजना के लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधाएं आती हैं परंतु नरेगा में तो अकुशल श्रमिक भी कुशल श्रमिकों का काम कर रहे हैं जिससे विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। सेज भी अच्छी कृषि योग्य जमीने ले लेते हैं जिससे पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो जाती हैं। उनका सुझाव था कि इंदिरा गांधी नहर परियोजना को ही विशेष कृषि क्षेत्र घोषित कर दिया जाना चाहिए ताकि इसके क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया जा सके। जैसे मिस्र वालों ने नील नदी का उपयोग किया। इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में पानी जमा होने, लवणता और उनका खेती पर प्रभाव जैसी गंभीर समस्याएं हैं। यदि इसे विशेष क्षेत्र का दर्जा दे दिया जाए तो भूमि व जल का वैज्ञानिक उपयोग हो सकेगा तथा फसलों की खेती में बढ़ोतरी होगी। डॉ. स्वामीनाथन ने किसानों को पशुओं की राठी नस्ल बढ़ाने का सुझाव और किसानों को उच्च मूल्य की फसलों को उगाने तथा संरक्षित कृषि करने की भी सलाह दी ताकि प्रति लीटर पानी की खपत से वे अधिकतम आय प्राप्त कर सकें। खेती की नई तकनीक के उपयोग से ऐसा संभव है।
नरेगा को वैज्ञानिक आधार दें : इस स्तम्भ में हरित क्रांति के जनक डॉ. स्वामीनाथन के समाचार-पत्रों में प्रकाशित सुझावों को शामिल करने का एक मात्र उद्देश्य राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को किस प्रकार वैज्ञानिक आधार देकर संगठित किया जाए, इसे सामने लाना था। दूसरे डॉ. स्वामीनाथन ने नरेगा में हो रहे कामों को वैज्ञानिक आधार देने की आवश्यकता प्रतिपादित की है। उन्होंने नरेगा में हो रहे कामों के फलस्वरूप बदलते ग्रामीण परिदृश्य को एक प्रकार से सशक्त समर्थन देते हुए कुशल व अकुशल श्रमिकों के श्रेणी विभाजन को अधिक वजन नहीं देने की आवश्यकता का संकेत दिया है परंतु साथ ही यह कहा है कि नरेगा में हो रहे कार्यों और कार्यरत श्रमिकों की मदद करनी चाहिए। इन कामों को कैसे वैज्ञानिक आधार देकर अधिकाधिक उपयोगी बनाया जाए, यह देखना और करना चाहिए।
भ्रष्टाचार पर लगाम लगने से घटा काम : समाचार पत्रों में प्रकाशित एक आकलन के अनुसार नरेगा के कामों में 35 प्रतिशत कमी आई है। इस संबंध में प्रमुख ग्रामीण विकास सचिव सी.एस. राजन ने बताया कि यह कार्यक्रम मजदूरों की मांग के अनुसार चलता है। इसमें काम और खर्च को बढ़ाना अपने हाथ में नहीं है। उन्होंने बताया कि काम सीमित नहीं किया गया है। किसी को काम नहीं मिला हो ऐसा नहीं है। किसी को बुलाकर भी काम नहीं दिया जा सकता परंतु भ्रष्टाचार को रोकने के कारण खर्च में आंशिक कमी आई है जो अच्छा संकेत है। वर्ष 2008 के मुकाबले काम में कमी का मुख्य कारण यह है कि उस समय अकाल था। इस बार मानसून अच्छा रहा इससे लोगों को खेतों में काम मिल रहा है। सामग्री में कमी का कारण सरपंचों और ग्राम सेवकों की हड़ताल से हुआ विलम्ब था। अब टेण्डर हो रहे हैं। सच्चाई यह है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगने से काम घटा है, ग्रामीण विकास विभाग की अक्षमता से नहीं।
सडक़ों पर धार्मिक स्थलों का निर्माण रोका जाए : मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 8 दिसम्बर को राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा की। बैठक में यह मुद्दा उठा कि प्रमुख सडक़ों और चौराहों पर एवं रास्तों में धार्मिक स्थलों की संख्या बनी हुई है। जिस पर मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को निर्देश दिए कि कलेक्टरों को कानून का कड़ाई से पालन करने के लिए पाबन्द किया जाये। प्रदेश में करीब 58 हजार ऐसे धार्मिक स्थल बने हुए हैं जो आवागमन में बाधा बने हुए हैं। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिये कि प्रमुख सडक़ों पर धार्मिक स्थलों का निर्माण पूरी तरह रोका जाये। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाये।
सडक़ दुर्घटनाएं रोकी जाएं : मुख्यमंत्री ने सडक़ दुर्घटनाएं रोकने पर फिर जोर दिया। उनका सुझाव था कि दुर्घटनाएं रोकने के लिए यातायात पुलिस को प्रशिक्षण दिया जाए। फिटनेस नियमों का सख्ती से पालन हो, शराब पीकर वाहन चहाने वालों के विरुद्ध निरंतर अभियान चलाया जाये। उन्होंने शादी के दौरान शौर-शराबा रोकने पर भी जोर दिया।
पुलिस की छवि सुधरे : इसी संदर्भ में पुलिस महानिरीक्षक बी.एल. सोनी ने कंट्रोल रूम में 5 दिसम्बर को कडक़ अंदाज में अधिकारियों को निर्देश दिये कि यदि अपराध नहीं रुकते, क्राइम पर कन्ट्रोल नहीं हो तो फिर वे पुलिस लाइन का रास्ता पकड़ लें क्योंकि राजधानी की पुलिस से जनता बहुत अपेक्षा रखती है। दूसरी तरफ पुलिस महानिदेशक हरीश चन्द्र मीणा ने राज्य के पूर्वी जिलों का दौरा किया। उन्होंने बताया कि आज भी आम आदमी थाने में जाने से डरता है। पुलिस के प्रति बनी इस छवि को सुधारने के लिए वह दौरा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता में पुलिस की छवि को सहृदय व बेदाग करना ही मेरा ध्येय है।
आय बढ़ी, घाटा घटा : मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हाल ही बजट की अद्र्धवार्षिक समीक्षा की जिसमें यह तथ्य उभर कर आया कि चालू वित्तीय वर्ष में राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि हुई है और पिछले साल के मुकाबले घाटे में भारी कमी आई है। पिछले साल प्रथम छ: माह में राजस्व घाटा 4 हजार 185 करोड़ रुपये रहा जबकि इस वर्ष केवल एक हजार 205 करोड़ रुपये ही रहा। तुलनात्मक दृष्टि से राजस्व घाटे में 2 हजार 980 करोड़ रुपये की कमी आई है।
क्षेपक मौन क्रान्ति : राजस्थान के बस्सी में गत 27 नवम्बर को पहले ग्राम न्यायालय का उद्घाटन देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने किया। ग्राम न्यायालयों के माध्यम से न्याय को गरीब की चौखट तक पहुंचाया जाएगा। पूरे देश में 5000 ग्राम न्यायालय खोले जाएंगे। राजस्थान में प्रथम चरण में 47 न्यायालय खोले जा रहे हैं। कुल 135 ग्राम न्यायालय प्रस्तावित हैं। पूरे देश में इसके लिए 500 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। कानून मंत्री ने ग्राम न्यायालयों की स्थापना को मौन क्रान्ति बताया। (शिवम् मीडिया)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें