शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

राजस्थान बीमारू राज्यों से बेहतर

खबर में खबर

- संतोष निर्मल
शाबास अन्नू ! : आमेर (जयपुर) की अन्नू ने जो साहसी काम किया है, उसके लिए वह प्रशंसा की हकदार है। अन्नू ने साबित कर दिया है कि गलत का काम विरोध होना ही चाहिए, भले ही उसे करने वाला आपका कितना ही नजदीकी या घनिष्ठ क्यों न हो ? अन्नू ने तो इससे आगे बढक़र अपने माता-पिता का ही विरोध कर दिया। घटना ये थी कि अन्नू की दो छोटी बहनों की शादी उसके माता-पिता ने तय कर दी। इन बहनों की उम्र मात्र 12 और 9 वर्ष थी। शादीशुदा बड़ी बहन अन्नू को जब इसका पता चला तो उसने पीहर आकर पहले तो अपने माता-पिता को समझाने की कोशिश की, उसके माता-पिता ने दोनों नाबालिग बहनों की शादी उनसे उम्र के तीन गुने व्यक्ति से तय कर दी थी। अन्नू के समझाने पर भी जब वे नहीं माने तो उसने जिला कलेक्टर से अपने माता-पिता के खिलाफ शिकायत कर दी। जिला कलेक्टर ने तुरंत कार्यवाही कर उस शादी को रुकवा दिया। इससे ये दोनों बहनें बाल विवाह की भेंट चढऩे से बच गईं। अन्नू ने ऐसा करके साबित कर दिया कि माता-पिता भी यदि कोई गलत काम करते हैं तो उनका भी विरोध होना चाहिए। अन्नू जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति वाली लड़कियों के रहते हुए सामाजिक बुराइयां ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकेंगी।
रोजगार की रफ्तार : पिछले कुछ दिनों से राजस्थान के युवाओं के चेहरों की चमक बढ़ गई है, इसका कारण ये है कि राजस्थान सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियों की घोषणा कर बेरोजगारों को राहत दी है। सरकार ने सिर्फ घोषणा ही नहीं की, बल्कि इन रिक्त पदों पर भर्ती की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। जिनमें प्रक्रिया नहीं शुरू हुई है, उसमें भी शीघ्र शुरू हो जाएगी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हाल ही शिक्षा, पुलिस, पंचायती राज, सचिवालय, परिवहन, वन विभाग में रिक्त पदों पर नियुक्तियों को हरी झंडी दे दी थी। इसमें शिक्षा विभाग में सबसे अधिक पद रिक्त हैं। यहाँ करीब 50 हजार शिक्षकों की भत्र्तियां होनी हैं। इसकी प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है, जनवरी में इसके लिए परीक्षा भी हो जाएगी। इसके अलावा ग्राम सेवक कृषि पर्यवेक्षक पदों पर भी भत्र्तियां होनी है। कई सालों में यह पहला मौका है, जब इतनी बड़ी संख्या में विभिन्न विभागों में नौकरियों की घोषणा हुई है। दो वर्ष पूरे कर चुकी गहलोत सरकार ने सत्ता संभालते ही घोषणा कर दी थी कि युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना उनकी सरकार का मुख्य लक्ष्य है। गत भाजपा शासन में नौकरियों पर एक तरह से ताला ही लगा हुआ था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उस ताले को खोलकर युवाओं को जो सहारा दिया है, वह स्वागत योग्य है।
पुरस्कार और मदद : नौकरियों के मामले में तो गहलोत सरकार ने हाथ खोल ही दिया है, साथ ही वह पुरस्कार और मदद देने में भी सरकार काफी आगे हैं। दिल्ली में कामनवेल्थ और चीन में हुए एशियन गेम्स में अपनी प्रतिभा दिखाकर लौटे खिलाडिय़ों को गहलोत सरकार ने पुरस्कारों से लाद दिया है। इन पुरस्कारों में नकद राशि, सरकारी नौकरी, पदोन्नति व मकान शामिल हैं। इसी तरह गहलोत सरकार उन लोगों की मदद करने में भी पीछे नहीं रही, जो किसी दुर्घटना या हादसे का शिकार हो गए थे। इसमें मुख्यत: जयपुर बम बलास्ट और जोधपुर मेहरानगढ़ दुखांतिका से प्रभावित परिवार शामिल हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बम ब्लास्ट से प्रभावित परिवारों की एक युवती की हाल ही में हुई शादी में आर्थिक मदद की। इस तरह के दो परिवारों की युवतियों की शादी में भी वे पीछे नहीं रहे थे। भाजपा शासन में हुई मेहरानगढ़ दुखांतिका ने भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को काफी द्रवित किया था। सत्ता में आने पर उन्होंने इसके प्रभावितों की मदद में कोई कमी नहीं रखी थी। हाल ही इस दुखांतिका से प्रभावित कुछ निर्धन परिवारों को एक निजी भवन निर्माता ने नि:शुल्क आवास उपलब्ध कराए। जोधपुर के महापौर ने इससे प्रेरित होकर अन्य प्रभावित परिवारों के लिए आवास बनाने की इच्छा प्रकट की। इस पर भवन निर्माता ने उन्हें आश्वासन दिया कि यदि सरकार उन्हें जमीन उपलब्ध करवा दे तो वे और भी मकान बनाकर उन्हें नि:शुल्क दे देंगे। महापौर इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री से बात करने का प्रयास कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि महापौर अपने प्रयास में सफल होंगे, क्योंकि असहायों की मदद में मुख्यमंत्री कभी पीछे नहीं रहते।
 (शिवम् मीडिया)
मिड डे मील

राजस्थान बीमारू राज्यों से बेहतर
राधेश्याम तिवारी
ऐसा पहली बार हुआ है कि बच्चों को दोपहर के भोजन की सुविधाएं मुहैया कराने में असफल रहे छह राज्यों में बिहार के साथ या बीमारू प्रदेशों की सूची में राजस्थान का नाम शामिल नहीं किया गया है। इसे निश्चित रूप से प्रदेश के लिए एक सकारात्मक परिवर्तन माना जा सकता है। विश्व के सबसे बड़े देश में बच्चों के भोजन का कार्यक्रम चलाना आसान नहीं है । इस योजना के तहत लगभग 11.77 करोड़ बच्चों को स्कूलों में दोपहर का खाना दिया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट की नजर इस योजना पर नहीं होती तो इस कार्यक्रम को इतने वर्षों तक चलाना संभव नहीं हो पाता। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे कार्यक्रम की निगरानी करने के लिए आयुक्त स्तर के अधिकारियों की एक टीम तैयार कर दी थी ताकि वे इस पर निगाह रख सकें कि क्या हर स्कूली बच्चे को एक वर्ष में 200 दिनों तक भोजन दिया जा रहा है या नहीं?
स्ुाप्रीम कोर्ट की दिलचस्पी के कारण कई बार इस मामले का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला गया कि केवल छह राज्यों झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम में, इस कार्यक्रम की हालत बेहद खराब है। इसमें भी सबसे अधिक खराब स्थिति झारखंड की है, जहां लगभग 67 प्रतिशत बच्चे ही इस योजना का लाभ उठा पाते हैं। मध्यप्रदेश के बारे में सुप्रीम कोर्ट के आयुक्त के सूत्रों के अनुसार, बच्चों की संख्या को देखते हुए 5.48 लाख टन की खपत होनी चहिए थी वहां वर्ष 2008-09 में केवल 2.17 लाख टन खाद्यान का उपयोग किया गया। इस अध्ययन की इस सूची में राजस्थान का नाम न आना प्रदेश के लिए एक सकारात्मक उपलब्धि है।
वैसे तो इन राज्यों ने अपने बचाव में कई तरह की समस्याओं की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है जिसमें खाद्यानों और फलों की बढ़ती हुई महंगाई भी शमिल है। इसकी वजह से जिस प्रकार के पौष्टिक आहार देने की बात की जा रही थी वैसा नहीं हुआ है। सरकारों के पास इतना फंड नहीं है कि उससे बच्चों को उत्तम किस्म का पौष्टिक आहार दिया जाए। जिन प्रदेशों का उल्लेख किया गया है वहां दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता में कमी तो है ही साथ ही उनको देने में निरंतरता भी नहीं है। यहां उल्लेखनीय है कि 2001 से ही इस योजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश मिलने लगे थे।
रंभ में शिक्षकों ने इस बात पर आपत्ति की थी कि बच्चों के लिए भोजन तैयार करना और पढ़ाना संभव नहीं था इसलिए बाहरी एजेंसियों से भोजन मंगाना पड़ता था और उनके पास समय की कमी थी। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों की इन शिकायतों का निराकरण करने के ख्याल से स्कूल परिसर में ही ताजा भोजन बनाने की अनुमति देकर उनकी आपत्तियों को दूर कर दिया। यहां तक कि रसोइए की बहाली के आदेश भी दिए गए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सतत जानकारी रखने के कारण ही ऐसा संभव हो सका। अन्यथा 2001 से लेकर 2004 तक तो सभी स्कूलों ने इस योजना के खिलाफ अपने हाथ खड़े कर दिए थे।
स्थितियों की गंभीरता को देखते हुए ही 2004 में सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल देना पड़ गया। इसी का परिणाम हैे कि स्कूलों में बच्चों को कम से कम खिचड़ी खाने को मिल जाती है, लेकिन समस्याओं का अंत आज भी नहीं हो पाया। अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार आहार देने से लेकर पकाने तक की व्यवस्था सरकारी होने के बावजूद उन बच्चों को खाना नहीं मिल पाता है जिनके पास कोई बर्तन नहीं होता। इसके लिए बच्चों को अपने-अपने पात्रों को अपने बस्तों के साथ घर से लाना पड़ता है। जिन स्कूलों में खाने के पात्र उपलब्ध कराए जाते हैं वहां बच्चों को बारी-बारी से खाना पड़ता है और उन बर्तनों के धोने में समय बर्बाद हो जाता है। जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई का समय नहीं मिलता।
ऐसी बात भी नहीं है कि जिन राज्यों का नाम नहीं लिया गया है वहां सरकार द्वारा दिए जा रहे स्कूलों में मिड डे मील यानि दोपहर के भोजन की निरंतरता और गुणात्मकता काफी संतोषजनक है।
सुुप्रीम कोर्ट ने मिड-डे मील की योजना के तहत 100 ग्राम का आहार प्राईमरी स्कूल के बच्चों के लिए तथा बड़े बच्चों के लिए 150 ग्राम आहार देने का निर्देश तो दिया था और स्कूलों में इस आदेश का पालन भी किया जाने लगा था, लेकिन महंगाई के कारण इस योजना की सफलता में रुकावटें आ रहीं हैं। इसकी वजह से राज्य सरकार के बजट में बढ़ोत्तरी करने की जरूरत हो गई है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि एक वर्ष में 11.77 करोड़ बच्चों को 200 दिनों तक पूरी पोैष्टिकता के साथ आहार देने के लिए सरकार को अपने बजट में खास कर, इस मद में, काफी वृद्धि करनी पड़ सकती है। ऐसा तभी संभव है जब महंगाई की बढ़ती दर को नियंत्रित किया जाए। यदि बजट बढऩे के साथ महंगाई बढ़ती रहेगी तो इस समस्या का कोई हल नहीं निकल सकता।
                                                                                                                                                                                 (शिवम् मीडिया)

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