मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

रत्न उगलने लगे हैं रतनाराम के खेत

रत्न उगलने लगे हैं रतनाराम के खेत


(डॉ. दीपक आचार्य, जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी, जैसलमेर)
जैसलमेर /आम आदमी के जीवन में आत्मनिर्भरता भरे सुनहरे भाग्य का आवाहन करने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना राजस्थान के सरहदी जिले जैसलमेर में गरीबों के उत्थान की भगीरथी साबित हो रही है। सदियों से पिछड़े रहे लोगों का भाग्य इस योजना की वजह से करवट ले रहा है और लोकजीवन में खुशहाली और जीवनयापन का सुकून निरन्तर पसरने लगा है।
जन साधारण को प्रतिवर्ष सौ दिवस का रोजगार प्रदान करने हेतु प्रारम्भ की गई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना मरुस्थलीय जैसलमेर जिला वासियों के जीवन में बहुत बड़ा बदलाव ला रही है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले बीपीएल परिवारों के लिए इस योजना में करवाये जा रहे कार्यो से जहाँ इन गरीब परिवारों के घरों में खुशहाली आ रही है वहीं स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप करवाए जा रहे जनोपयोगी कार्यो से सामुदायिक विकास को नयी गति मिली है।
          जैसलमेर जिले के सांकड़ा पंचायत समिति मुख्यालय के पास स्थित चंणाणियों की ढाणी निवासी रतनाराम मेघवाल के खेत में नरेगा योजना के अन्तर्गत निर्मित खड़ीन से उसकी आर्रि्थक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन का मंजर स्पष्ट दिखाई देने लगा है। पश्चिमी राजस्थान में इस वर्ष हुई सुखद वर्षा के कारण रतनाराम के खेत में वर्तमान में बाजरा एवं ग्वार की फसलें लहलहा रही हैं। वर्षों बाद इस वर्ष नरेगा में निर्मित खडीन में पर्याप्त मात्रा पहुंचे पानी की बदौलत रतनाराम के खलिहान रत्न उगलने की तैयारी में हैं।
          महात्मा गांधी नरेगा योजना के अन्तर्गत रतनाराम मेघवाल के खेत में खड़ीन निर्माण के लिए  ढाई लाख की धनराशि स्वीकृत की गई थी। उसके खेत में आस-पास के मगरे से हर साल बारिश का पानी बहकर आता था मगर खेत की मजबूत पाल नहीं होने के कारण यह फिजूल ही बह जाता था। आर्थिक दृष्टि से कमजोर रतनाराम हर वर्ष मन मसोस कर रह जाता था।
नरेगा योजना रतनाराम के लिए राज का वरदान साबित हुई। इस योजना के अन्तर्गत रतनाराम के खेत में खड़ीन निर्माण का कार्य स्वीकृत किया गया। यह कार्य 16 जून 2009 को प्रारंभ किया गया तथा 15 मार्च 2010 को कार्य पूर्ण किया गया। खडीन निर्माण कार्यो के अन्तर्गत श्रम मद में 2 लाख 43 हजार 98 रुपये व्यय किये गये तथा सामग्री मद में 53 हजार 582 रुपये की राशि खर्च की गई। खड़ीन निर्माण के अन्तर्गत 2 हजार 973 मानव दिवसों का सृजन किया गया। खेत में लगभग एक हजार फुट लम्बी, 5 फुट ऊंची दीवार का निर्माण कराया गया। मगरे के पानी के तेज प्रवाह के कारण रतनाराम के खेत की उपजाऊ मिट्टी  भी पानी के साथ बहकर बाहर चली जाती थी। नरेगा योजना में निर्मित खड़ीन के कारण आस पास के मगरे का पूरा पानी रतानराम मेघवाल के खेत में जमा हो रहा है। पानी के साथ खाद घास-फूस के बह कर खेत में आ जाने से उसके खेत की ऊर्वरकता में भी अभिवृद्धि हुई है। इस स्थिति में अच्छी वर्षा होने पर जहाँ रतनाराम के खेत में भरपूर खरीफ की फसल पैदा हो सकेगी। वहीं अक्टूबर माह में वर्षा होने पर वह रबी की फसल भी प्राप्त कर सकेगा।

          रतनाराम बताता है कि उसके पूर्वजों ने रियासत काल में एक सौ ग्यारह बीघा जमीन मात्र उन्नीस रुपये देकर राजपूत परिवार से खरीदी थी। पहले गर्मियों में आंधियां चलने पर खेत की रेत को उड़ने से रोकने के लिए रतनाराम का परिवार खेत में लकड़ियों एवं झाड़-झंखाड़ों को एक सीध में लगाकर कच्ची बाड़ का बनाने का प्रयास करता था जिसे स्थानीय भाषा में ‘कणा बनाना कहा जाता है मगर जब भी वर्षा आती तो पानी के वेग में में लकड़ियों की यह दीवार बह जाती थी। ऎसे में  रतनाराम के पास पानी रोकने के अपने प्रयासों की विफलता को चुपचाप देखते रहने के सिवा कोई चारा न था।  नरेगा योजना की बदौलत रतनाराम की किस्मत ही बदल गई है। उसे अनुमानतः 30 बोरी बाजरा, 20 बोरी ग्वार एवं 5 बोरी मतीरा बीज आदि के उत्पादन की उम्मीद हैै। नरेगा की खड़ीन से आये बदलाव से रतनाराम को इस मर्तबा सवा लाख के खाद्यान्न उत्पादन की आशा है।

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